सार लेखन अथवा संक्षिप्तीकरण | SAAR LEKHAN

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किसी गद्यांश अथवा पद्यांश के मूल पाठ या भावार्थ में किसी प्रकार का परिवर्तन किए बिना उसे लगभग एक तिहाई शब्दों में लिखना सार लेखन अथवा संक्षिप्तीकरण कहलाता है।

यह सक्षेप में इस तरह होना चाहिए कि अनुच्छेद की मूल भावना खंडित न हो। संक्षेपण की आवश्यकता मनुष्य के आज के व्यस्ततम जीवन में समयाभाव के कारण उत्पन्न हुई। विस्तृत विवरणों के स्थान पर संक्षिप्त लेखन जीवन की आवश्यकता हो गया। इसलिए संक्षेपण लेखन की ऐसी शैली है जिसमें कम समय और श्रम में सारगर्भित, साभिप्राय लेखन के साथ अनावश्यक वर्णन से बचा जा सकता है।

संक्षिप्तीकरण से सम्बन्धित सामान्य नियम

1.संक्षिप्तीकरण मूलतः अनुच्छेद के भावार्थ का स्वतःपूर्ण पाठ होता है इसलिए संक्षिप्तीकरण को पढ़ने के बाद मूल अनुच्छेद को पढ़ने की आवश्यकता नहीं रहती ।

2.संक्षिप्तीकरण मूल पाठ का लगभग एक-तिहाई सार संक्षेप होता है इसलिए पाठ की को खंडित किए बिना कम शब्दों में ही लिखा जाना चाहिए। मौलिकता

3.संक्षिप्तीकरण मौलिक रचना को ही कम शब्दों में लिखने की शैली होने के कारण उसमें प्रयुक्त भाषा ऐसी होनी चाहिए जिसमें मूल पाठ के अनुरूप कम शब्दों में अधिक विवरण व तथ्यों को समेटा जा सके।

4. संक्षिप्तीकरण में ‘गागर में सागर’ भरने की उक्ति सार्थक होती है अतः भाषा की सामासिकता के साथ भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण तथा स्पष्ट होनी चाहिए।

5.किसी भी अनुच्छेद अथवा पाठ का संक्षिप्ततम रूप उसका ‘शीर्षक’ ही होता है तथा वही उस पाठ का सार-संकेतक है जिससे पाठक उसके विभिन्न पक्षों का अनुमान कर सकता है। अतः शीर्षक पाठ का केंद्रीय भाव प्रकट करनेवाला, संक्षिप्त तथा आकर्षक होना चाहिए।

6. संक्षिप्तीकरण में वाक्यों को ज्यों का त्यों दोहराना नहीं चाहिए बल्कि उसके क्रिया रूपों में यथोचित परिवर्तन कर उन्हें सरल व सुबोध बनाया जाना चाहिए।

संक्षिप्तीकरण को सार, संक्षेप, सार-संक्षेप, सारांश अथवा संक्षेपण भी कहा जाता है।

निम्न अवतरणों का संक्षेपण कीजिए

1. किसी देश की उन्नति एवं अवनति उस देश के साहित्य पर ही अवलंबित है। चाहे वह देश को उन्नति की चरम सीमा पर पहुँचा दे और चाहे तो अवनति के गर्त में गिरा दे। कवि रवि की पहुँच से भी अधिक प्रकाश करता है। वही निर्जीव जाति में प्राण-प्रतिष्ठा करता है और निराशापूर्ण हृदय में आशा का संचार करता है। वही राजनीति को प्रेरणा देता है तथा राजनीतिज्ञों का पथ-प्रदर्शन करता है। वही अतीत के गौरव-गीत गाता है और साथ ही भविष्य की स्वर्णिम कल्पना करता है; वही सोई हुई जाति को जगाता है और उत्साह का संचार करता है।

संक्षिप्तीकरण- देश का उत्थान-पतन साहित्य पर ही निर्भर है। जहाँ न पहुँचे रवि वहाँ पहुँचे कवि। साहित्य निर्जीव लोगों में प्राण-प्रतिष्ठा करनेवाला, राजनीति का पथ-प्रदर्शक, अतीत का गायक और भविष्य का स्वप्नदृष्टा होता है।

2. पृथ्वी माता है, मैं उसका पुत्र हूँ। यही स्वराज्य की भावना है। जब प्रत्येक व्यक्ति जिस पृथ्वी पर उसका जन्म हुआ है, उसे अपनी मातृभूमि समझने लगता है, तो उसका मन मातृभूमि से जुड़ जाता है। मातृभूमि उसके लिए देवता हो जाती है। उसके हृदय के भाव मातृभूमि के हृदय में जा मिलते हैं। जीवन में चाहे जैसा अनुभव हो, वह मातृभूमि से द्रोह की बात नहीं सोचता, मातृभूमि के प्रति जब यह भाव दृढ़ होता है, वहीं से सच्ची राष्ट्रीय एकता का जन्म होता है। उस स्थिति में मातृभूमि पर बसने वाले नागरिकगण एक-दूसरे से सौदा करने या शर्त तय करने की बात नहीं सोचते । मातृभूमि के प्रति अपने कर्त्तव्य की बात सोचते हैं।

संक्षिप्तीकरण – जब व्यक्ति अपनी मातृभूमि से माता के समान प्रेम करता है तब राष्ट्रीयता का जन्म होता है। मातृभूमि के प्रति अपने कर्त्तव्य का निर्वाह करते हुए वह कभी उसके प्रति कृतघ्नता का व्यवहार नहीं करता।

3.आधुनिक जीवन में समाज और राष्ट्र के स्तर पर समाचार-पत्रों का बहुत ही विशिष्ट और ऊँचा स्थान है। समाचार-पत्र मानो अपने देश की सभ्यता, संस्कृति और शक्ति के मानदण्ड बन गए हैं। जिस देश में जितने अच्छे और जितने अधिक समाचार-पत्र होते हैं वह देश उतना ही उन्नत और प्रभावशाली समझा जाता है, बहुत-से क्षेत्रों में जो काम समाचार-पत्र कर जाते हैं वे बड़ी सेनाएँ और बड़े-बड़े राजनीतिज्ञ भी नहीं कर पाते। समाचार-पत्र एक ओर तो जनता का मत सरकार तक पहुँचाते हैं और दूसरी ओर सुदृढ़ एवं संतुष्ट लोकमत तैयार करते हैं। देश को सभी प्रकार से सजग रखने में समाचार पत्रों की अहम भूमिका है और इसके मुकाबले कोई अन्य माध्यम इतना सशक्त नहीं कहा जा सकता।

संक्षिप्तीकरण- समाचार-पत्रों का देश और समाज में बड़ा महत्त्व है। ये राष्ट्र की सभ्यता, संस्कृति और शक्ति के मानदण्ड होते हैं। ये सुदृढ़ लोकमत तैयार करने के सशक्त साधन हैं। समाचार-पत्र सरकार पर भी नियंत्रण रखते हैं और देश को सजग तथा सजीव बनाये रखते हैं।

अभ्यास हेतु अनुच्छेद (संक्षिप्तीकरण कीजिए)

1.आज के भागदौड़ के इस युग में न केवल व्यापारी, वकील, अभिनेता, शिक्षक, चिकित्सक, इंजीनीयर और प्रबंधक ही तनाव के शिकार हैं, बल्कि अपने केरियर और परीक्षा से चिन्तित छात्र-छात्राएँ भी कम तनावग्रस्त नहीं हैं। इसका बुरा प्रभाव उनके स्वास्थ्य पर पड़ता है। कुछ लोग आर्थिक तंगी के कारण तनावग्रस्त हैं तो कुछ सभी प्रकार की सुविधाओं से संपन्न होते हुए उन्हें बनाए रखने और निरंतर बढ़ाने की भाग-दौड़ से तनावग्रस्त हैं। यह तनाव हृदय रोग, अल्सर, मधुमेह और दूसरी बीमारियों का भी कारण बन रहा है। इस तनाव और भागदौड़ के कारण व्यक्ति अपने खानपान तक की उपेक्षा करता है और कभी-कभी तो दिन-भर भोजन तक नहीं कर पाता। गंभीर समस्याओं से जूझते हुए उसे इतना भी समय नहीं मिल पाता कि वह अपने घर-परिवार, सगे संबंधियों के साथ फुरसत से बैठ सके।

2. लोक गीतों की मूल बोली अथवा भाषा का पता लगाना कठिन ही नहीं, असंभव-सा है, क्योंकि लोकगीत लोक-जीवन से उत्पन्न होकर भाषा के प्रवाह मे तैरते चलते हैं। मनुष्य के कंठ ही उनके घाट हैं। उपयुक्त कंठ पाकर कोई कहीं बसेरा ले लेता है। लोकगीतों पर उनके आसपास का ऐसा प्रभाव पड़ जाता है कि उनका मूल रूप कायम नहीं रहता। इससे जहाँ वे गाये जाने लगते हैं, वहाँ के बहुत-से शब्द, जो पर्यायवाची होते हैं, उनमें बैठ जाते हैं और उनके मूल शब्दों को स्थान च्युत कर देते हैं। इसमें कौनसा गीत पहले-पहले कहाँ बना इसका पता नहीं लगाया जा सकता। केवल इस बात का पता लग सकता है कि कौनसा गीत कहाँ गाया जाता है ।


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