राजस्थान के प्रमुख राजपूत वंशों का परिचय – 3

महाराणा प्रताप- (1572 3597 ई.)

9 मई 1540 को कुंभलगढ़ में जन्मे प्रताप 1572 ई. में मेवाड़ के शासक बने। महाराणा उदयसिंह ने जगमाल को अपना उत्तराधिकारी बनाया था, मगर सरदारों ने उसे स्वीकार नहीं किया और प्रताप को गद्दी पर बिठा दिया। इस समय दिल्ली पर मुगल बादशाह अकबर का शासन था। प्रताप के सामने दो मार्ग थे या तो वह अकबर की अधीनता स्वीकार कर सुविधापूर्ण जीवन बिताये या अपना स्वतंत्र अस्तित्व और अपने देश की प्रतिष्ठा बनाये रखे। दूसरा विकल्प चुनने की स्थिति में उसे अनेक कष्ट उठाने थे, फिर भी प्रताप ने दूसरे विकल्प ‘संघर्ष’ को ही चुना। इस संघर्ष की तैयारी में उसने सबसे पहले मेवाड़ को संगठित करने का बीड़ा उठाया। अपने कर्त्तव्य और विचारों से उसने सामन्तों और भीलों का एक गुट बनाया जो सदैव देश की रक्षा के लिए उद्यत रहे। प्रताप ने प्रथम बार इन्हें अपनी सैन्य व्यवस्था में उच्च पद देकर इनके सम्मान को बढ़ाया। मुगलों से बचकर युद्ध का प्रबन्ध करने के लिए उसने गोगुंदा से अपना निवास स्थान कुंभलगढ़ स्थानांतरित कर लिया। अकबर किसी भी तरह से मेवाड़ को अपने अधीन करना चाहता था। अतः उसने समझौते के प्रयास किये। 1572 ई. से 1576 ई. के मध्य उसने चार शिष्ट मण्डल क्रमशः जलाल खाँ, मानसिंह, भगवानदास एवं टोडरमल के नेतृत्व में भेजे। मगर महाराणा ने संधि करने में किसी प्रकार की रूचि नहीं दिखाई। अतः मेवाड़ को मुगल आक्रमण का सामना करना पड़ा। 1576 ई. के प्रारंभ में अकबर मेवाड़ अभियान की तैयारी हेतु अजमेर पहुँचा और वहीं उसने मानसिंह को मेवाड़ अभियान का नेतृत्व सौंपा।

18 जून 1576 ई. को खमनौर के पास मुगल सेना का प्रताप से युद्ध हुआ जो इतिहास में हल्दीघाटी के युद्ध के नाम से प्रसिद्ध है। इस युद्ध में मुगल सेना का मुख्य सेनापति आमेर का मानसिंह था जबकि प्रताप की सेना के हरावल (अग्रिम दस्ता) का नेतृत्व हकीम खां सूर कर रहा था। युद्ध में प्रताप के जीवन को संकट में देखकर झाला बीदा ने प्रताप का मुकुट धारण कर युद्ध किया और प्रताप को युद्धभूमि से दूर भेज दिया। यह युद्ध अनिर्णायक रहा। इस युद्ध को अबुल फजल ने खमनौर का युद्ध, बदायूनी ने गोगुंदा का युद्ध तथा जेम्स टॉड ने हल्दीघाटी का युद्ध कहा है। हल्दीघाटी के युद्ध के बाद महाराणा प्रताप ने पहाड़ों में रहते हुए वहीं से मुगलों को परेशान करने के लिए धावे मारना शुरू कर दिया।

1576 से 1585 तक अकबर ने मेवाड़ पर अधिकार करने के लिए अनेक अभियान भेजे किन्तु अधिक सफलता नहीं

मिली। इस कालखण्ड में दो महत्त्वपूर्ण घटनाएं घटित हुई। महाराणा प्रताप के पुत्र अमरसिंह ने 1580 अचानक शेरपुर के मुगल शिविर पर आक्रमण कर अब्दुर्रहीम खानखाना के परिवार की महिलाओं को बंदी बना लिया। इस सम्पूर्ण घटनाक्रम की जानकारी मिलने पर प्रताप ने मुगल महिलाओं को ससम्मान सुरक्षित भिजवाने के आदेश दिये। नारी सम्मान की भारतीय परम्परा का यह अनुपम उदाहरण है। 1582 में दिवेर की मुगल चौकी पर आक्रमण के समय कुंवर अमरसिंह ने वहां पर तैनात मुगल अधिकारी सुल्तान खां को भाले के एक ही वार से परलोक पहुंचा दिया। दिवेर की विजय के बाद इस पर्वतीय भाग पर प्रताप का अधिकार हो गया। एक छोटी सी मेवाड़ी सेना की यह बहुत बड़ी सफलता थी। यही कारण था कि कर्नल टॉड ने दिवेर को ‘मेवाड़ का मेराथन’ कहा है।

1585 ई. के बाद अकबर मेवाड़ की तरफ कोई अभियान नहीं भेज सका। 1585 से 1597 ई. के बीच प्रताप ने चित्तौड़ एवं माण्डलगढ़ को छोड़कर शेष राज्य पर पुनः अधिकार कर लिया, चावण्ड को अपनी राजधानी बनाया और राज्य में सुव्यवस्था स्थापित की। 19 जनवरी, 1597 को प्रताप की मृत्यु हो गई। चावण्ड के पास ‘बाडोली’ नामक गाँव में प्रताप का अंतिम संस्कार किया गया। प्रताप के संबंध में कर्नल टॉड लिखते हैं कि आलप्स पर्वत के समान अरावली में कोई भी ऐसी घाटी नहीं, जो प्रताप के किसी न किसी वीर कार्य, उज्ज्वल विजय या उससे अधिक कीर्तियुक्त पराजय से पवित्र न हुई हो। हल्दीघाटी मेवाड़ की थर्मोपल्ली और दिवेर मेवाड़ का ‘मेराथन’ है।

राणा अमरसिंह (1597–1620 ई.)

अमरसिंह 1597 ई. में मेवाड़ का शासक बना। शासक बनने के उपरांत उसे मुगल आक्रमणों का सामना करना पड़ा। 1613 ई. में जहाँगीर स्वयं अजमेर पहुँचा और शाहजादा खुर्रम (शाहजहाँ) को मेवाड़ अभियान का नेतृत्व सौंपा। उसने मेवाड़ में लूटमार एवं आगजनी द्वारा संकट की स्थिति उत्पन्न कर दी। मेवाड़ के सामंत युद्धों से ऊब गये थे एवं उनकी जागीरें भी वीरान हो गई थी। अतः उन्होंने कुँवर कर्णसिंह को अपने पक्ष में कर राणा पर मुगलों से संधि करने का दबाव डाला। सरदारों के दबाव के कारण अमरसिंह को झुकना पड़ा और मुगलों से संधि की स्वीकृति देनी पड़ी। फरवरी 1615 में मेवाड़ – मुगल संधि हुई । चित्तौड़ पुनः मेवाड़ को लौटा दिया गया, मगर उसकी मरम्मत नहीं की जा सकती थी। इस प्रकार विगत 90 वर्षों से चले आ रहे मेवाड़-मुगल संघर्ष का अंत हुआ। राणा अमरसिंह अपने इस कार्य से स्वयं खुश न था और उसने स्वयं को राजकार्य से विरक्त कर लिया। जहाँगीर के जीवन की यह एक बड़ी सफलता मानी जाती है।

महाराणा राजसिंह (1652-80 ई.)

राजसिंह ने शासक बनते ही चित्तौड़ की मरम्मत के कार्य को पूरा करने का निश्चय किया। लेकिन मुगल सम्राट ने इसे 1615 ई. की मेवाड़-मुगल संधि की शर्तों के प्रतिकूल मानते हुए चित्तौड़ दुर्ग को ढहाने के लिए तीस हजार सेना के साथ सादुल्ला खाँ को भेजा । राजसिंह ने मुगलों से संघर्ष करना उचित न समझकर अपनी सेना को वहाँ से हटा लिया। मुगल सेना कंगूरे एवं बुर्ज गिराकर लौट गयी। 1658 ई. में मुगल शाहजादों में उत्तराधिकार का युद्ध छिड़ा, मगर महाराणा किसी भी पक्ष का समर्थन नहीं करना चाहता था। अतः महाराणा टालमटोल करता रहा। जब औरंगजेब दिल्ली का शासक बना, तो प्रारम्भ में तो उसके संबंध राजसिंह से अच्छे रहे। औरंगजेब ने उसे 6000 जात एवं सवार का मनसब भी प्रदान किया, किंतु किशनगढ़ की राजकुमारी चारूमति, जिसका विवाह औरंगजेब से होने वाला था, से विवाह करके राजसिंह ने 1660 ई. में औरंगजेब को अप्रसन्न कर दिया। इसके बाद 1679 ई. में औरंगजेब द्वारा जजिया कर लगाने का राजसिंह ने विरोध किया। मुगल-मारवाड़ संघर्ष छिड़ने पर महाराणा राजसिंह ने राठौड़ों का साथ दिया। 1680 ई. में राजसिंह की मृत्यु हो गयी।


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